सिरोही (महावीर जैन)। दीक्षा दानेश्वरी आचार्य भगवंत गुणरत्नसूरी समुदाय के आचार्य रविरत्नसूरी एवं रश्मिरत्नसूरी की निश्रा में कृष्णगंज में 21 वर्षीय हीया कोठारी ने रविवार को विजयममुहूर्त में सांसारिक जीवन से संयम जीवन ग्रहण कर लिया। दीक्षा लेकर वे साध्वी हेमलरेखाश्रीजी की शिष्या बनी। नेमिनाथ भगवान की परम भक्त हीया का नूतन साध्वी के रूप में नामकरण ह्रींनेमिरेखाश्रीजी रखा गया हैं। वे प्रवर्तनी गुरूमैया पुण्यरेखाश्रीजी की 490 वीं शिष्या बनी। कृष्णगंज में दीक्षा मंडप में गिरनार तीर्थ की रचना कर परमात्मा नेमीनाथ के समक्ष आचार्य रविरत्नसूरीने जब दीक्षा के लिए रजोहरण यानि ओगा उन्हे अर्पित किया तो हीया नाचने लगी ओर उन्होंने दीक्षा नाण में विराजित तीन प्रमात्माओं के समक्ष तीन प्रदक्षिणा देकर परमात्मा के प्रति हर्षित भावों से उनका आभार व्यक्त किया।
कहा कि उनको संयम जीवन मिले उसका सपना चतुर्विद संघ के समक्ष आज पूरा हुआ। दीक्षीर्थी ने दीक्षा के बाद काम आने वाले उपकरणों के साथ गाजते-बाजते एवं नाचते हुए मंडप में प्रवेश किया तो दीक्षार्थी अमर रहो, दीक्षार्थी नो जय-जयकार से भक्तों ने मंडप को गुंजायमान कर दिया। मंडप पर सभी गुरूदेवों एवं साध्वीयों को वंदन कर हीया ने उनसे आर्शीवाद लिया। उसके बाद हीया के माता-पिता एवं परिवार के सभी सदस्यों ने विजय तिलक कर उसे संयम जीवन की शुभकामनाएं व विजयभव का आर्शीवाद दिया। हीया की गुरूमैया हेमलरेखाश्रीजी ने 7 वर्ष की आयु में दीक्षा लेकर दीक्षा के 26 वर्ष पूर्ण होने पर वे गुरूमाता बनी। जिस पर उनका भी चतुर्विद संघ ने वधामणा किया।
सांसारिक मोह माया का त्याग कर साध्वी का वेश धारण कर वे मंडप में ढोल ढमाको एवं वधामणे के साथ पहुंची तो विदुषी साध्वी गुणज्ञरेखाश्रीजी ने केश लोचन की विधि कर हीया के सिर के बाल हाथों से उखाड़े तब पंडाल में उपस्थित श्राविकाओं ने पार्लर में किसी पुरूष के हाथ से ब्यूटी या मसाज नहीं कराने का व्रत आचार्य की साक्षी में धारण कर एक नई पहल की तो मंडप में करतलध्वनी से उनका अभिनंदन किया गया।
इस अवसर पर जामनगर में विराजित 490 शिष्याओं की गुरूमैया प्रवर्तनी साध्वीश्री पुण्यरेखाश्रीजी ने हीया की दीक्षा पर भेजे अपने आर्शीवचन में कहा कि इस पंचम काल में भी जैन समाज में त्याग व तपस्या का डंका कायम है। मंडप में दीक्षा के अवसर पर वैराग्य से परिपूर्ण मारे नेम प्रिय जाउ हैं का भक्ति गीत रिलीज किया गया।
दीक्षीर्थी हीया एवं उनकी माता कला बेन व पिताश्री विनोद कोठारी का जैन संघ, कृष्ण्गंज की ओर से पंचमहाजनानों ने तिलक-हार-शॉल व अभिनंदन पत्र देकर बहुमान किया। कहा कि हीया ने साध्वी के रूप में पहली दीक्षा ग्रहण कर कृष्णगंज एवं आबूगोड समाज को गौरान्वित किया हैं जिसका हमें गर्व हैं।
दीक्षा के बाद हित शिक्षा प्रदान करते हुए आचार्य रविरत्नसूरी एवं रश्मिरत्नसूरी ने कहा कि हीया ने दीक्षा लेकर गुरू चरणों में अपना सम्पूर्ण जीवन समर्पित कर दिया है और वो अब आत्मा की खोज में डूब जाएगी। उन्होंने कहा कि संयम जीवन अपनाने वाला बहुत बड़ा त्यागी होता हैं वो अपने जीवन में सर्वपाप प्रवृतियों को त्याग कर धर्म आराधना तपस्चर्या एवं साधना में लीन हो जाता हैं। नमक खारा होने पर भी मानव नमक तक का भी त्याग जीवन में नहीं कर पाता हैं, लेकिन संयम जीवन में वो सब त्याग कर देता हैं और यही सयंम व त्याग धर्मबल को मजबूत बनाता हैं।
वर्षीदान कर सांसारिक सामग्री का दान-पुण्य किया
दीक्षा के पहले शनिवार को हीया ने वर्षीदान के वरघोड़े में ंअपने हाथों से अनेक सासांरिक सामग्री का दान-पुण्य किया और इस वरघोड़े में 36 कौम ने दीक्षार्थी हीया का फूलमालाओं एवं अक्षत से वधामणा कर उसके संयम मार्ग पर चलने के निर्णय की जय जयकार की। दीक्षा समारोह में आबूगोड के 27 गांवों के समाज बन्धुओं ने उपस्थित होकर साधु-साध्वी भगवंतों के दर्शन वदंन कर दीक्षार्थी व उसके माता-पिता को अपनी शुभकामनाएं दी ओर दीक्षीर्थी को भेंट किए जाने वाले उपकरणों को वोहराने यानि अर्पण का लाभ लिया।
दीक्षा के बाद आचार्य रविरत्नसूरी ने अचलगढ के लिए व रश्मिरत्नसूरी ने पाली के लिए विहार किया।
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